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कलेक्टर गाइडलाइन में किसी भी प्रकार की वृद्घि न किए जाने की पुरजोर मांग के साथ एमपीसीसीआई ने भेजीं आपत्तियां एवं सुझाव

ग्वालियर 24 फरवरी:-



कलेक्टर गाइडलाइन में किसी भी प्रकार की वृद्घि न किए जाने की पुरजोर मांग के साथ म.प्र. चेम्बर ऑफ कॉमर्स एण्ड इण्डस्ट्री (एमपीसीसीआई) द्बारा आज ऊर्जा मंत्री-श्री प्रद्युम्न सिंह तोमर, सांसद-श्री विवेक नारायण शेजवलकर, जिलाधीश व अध्यक्ष जिला मूल्यांकन समिति तथा संयोजक एवं वरिष्ठ जिला पंजीयक को आपत्तियां एवं सुझाव प्रेषित किये गये हैं।

एमपीसीसीआई अध्यक्ष-विजय गोयल, संयुक्त अध्यक्ष-प्रशांत गंगवाल, उपाध्यक्ष-पारस जैन, मानसेवी सचिव-डॉ. प्रवीण अग्रवाल, मानसेवी संयुक्त सचिव-ब्रजेश गोयल एवं कोषाध्यक्ष-वसंत अग्रवाल द्बारा प्रेस को जारी विज्ञप्ति में अवगत कराया गया है कि मध्यप्रदेश के यशस्वी मुख्यमंत्री माननीय श्री शिवराज सिंह जी चौहान द्बारा कलेक्टर गाइडलाइन में कमी की गई थी और यह घोषणा की थी कि आगामी तीन वर्ष तक कलेक्टर गाइडलाइन में किसी भी प्रकार की वृद्घि नहीं की जायेगी, जबकि जिला मूल्यांकन समिति द्बारा वर्ष 2022-23 के लिए कलेक्टर गाइडलाइन में 20 फीसदी की वृद्घि प्रस्तावित की गई है, जिसे वापिस लिया जाना चाहिए और कलेक्टर गाइडलाइन में किसी भी प्रकार की वृद्घि नहीं की जाना चाहिए।

इसके साथ ही वर्ष 2022-23 के लिए प्रस्तावित कलेक्टर गाइडलाइन पर एमपीसीसीआई द्बारा निम्नलिखित  सुझाव एवं आपत्तियां प्रेषित की गई हैं:-

1. सर्वप्रथम तो कलेक्टर गाइडलाइन की दरों में वृद्घि का कोई प्रस्ताव मध्यप्रदेश शासन के मुख्यमंत्री जी की वर्ष 2019 में की गई घोषणा कि तीन वर्ष तक कलेक्टर गाइडलाइन में किसी भी प्रकार का बदलाव नहीं होगा, उसके एकदम विपरीत है।

2. कोविड-19 महामारी के कारण ग्वालियर सहित संपूर्ण भारत वर्ष का व्यापार एवं उद्योग प्रतिकूल परिस्थितियों से जूझ रहा है और रियल एस्टेट का एक ऐसा कारोबार है कि यदि यह फलीभूत होता है तब हमारे यहाँ की विकास दर बढती है, जिसका कारण है कि इस व्यापार से कई व्यापार सीधे जुड़े हुए हैं और व्यापार के साथ-साथ रोजगार देने वाला भी यह खण्ड है।

3. ग्वालियर जिले की कलेक्टर गाइडलाइन में भोपाल और इंदौर की तुलना में पूर्व से ही विसंगति रखी हुई है। वाणिज्यिक दर जो भोपाल व इंदौर में 13 हजार रूपये प्रति वर्गमीटर और हमारे यहां यह 25 हजार प्रति वर्गमीटर है। यहां विचारणीय बिन्दु यह है कि जब जिला मूल्यांकन समिति कलेक्टर गाइडलाइन को सुधारने का कार्य करती है तब ऐसे बिन्दुओं पर उसका ध्यान क्यों नहीं जाता है ? और ऐसे ही कारणों का परिणाम है कि ग्वालियर शहर भोपाल-इंदौर की तुलना में पिछड़ रहा है।

अत: हमारी कड़ी आपत्ति के साथ यह अनुरोध है कि सबसे पहले यह विसंगति दूर की जाकर, आवासीय दर के समान की जाना चाहिए क्योंकि जहाँ तक निर्माण लागत की बात है तब आवासीय दर से कम लागत पर ही कॉमर्शियल निर्माण हो जाता है। अत: आवासीय दर से कतई अधिक नहीं होना चाहिए।

4. जिला मूल्यांकन समिति द्बारा जनता से जब दावा-आपत्ति की मांग की जाती है तब केवल प्रस्तावित गाइडलाइन का प्रारूप दिया जाता है जिससे तुलनात्मक अध्ययन संभव नहीं है। ऐसी स्थिति में वास्तविक आपत्ति नहीं आ पाती हैं और किसी भी ड्यूटी/शुल्क दर की वृद्घि या कमी में आम जनता के दावे-आपत्ति लिया जाना आवश्‍यक हो तब विधि अनुसार भी उसका तुलनात्मक प्रस्तुतीकरण होना चाहिए, जिसका अभाव रहता है। अत: सुझाव है कि जब भी कलेक्टर गाइडलाइन में बदलाव की आवश्‍यकता महसूस की जाए तो चाहे गये बदलाव का तुलनात्मक प्रस्तुतीकरण किया जायेगा, ऐसा प्रस्ताव भी समिति द्बारा किया जाना चाहिए।

5. आयकर प्रावधानों के मुताबिक भूमि/भवन/प्रॉपर्टी के क्रय-विक्रय पर लाभ होने की दशा में केपिटल गेन पर आयकर दिये जाने का प्रावधान है और इस केपिटल गेन की गणना के लिए कलेक्टर गाइडलाइन/सर्किल गाइडलाइन का मुख्य रोल होता है। विगत कुछ वर्षों से आयकर विभाग द्बारा केपिटल गेन की गणना के लिए वर्ष 1981 के स्थान पर वर्ष 2001 की कलेक्टर गाइडलाइन को बेस्ड माना गया है और जब किसी भी व्यक्ति के द्बारा भूमि/भवन/प्रॉपर्टी का क्रय-विक्रय किया जाता है तब आयकर निर्धारण हेतु वर्ष 2001 की कलेक्टर गाइडलाइन के हिसाब से प्रॉपर्टी की वैल्यू निकालना आम व्यक्ति की तो पहुँच से बाहर है। आश्‍चर्य यह है कि तकनीकी रूप से समक्ष व्यक्ति भी इसमें भ्रमित हो जाते हैं। इसके लिए बहुत आवश्‍यक है कि वर्ष 2001 की कलेक्टर गाइडलाइन को सरल भाषा व सरल गणना में परिवर्तित कराकर पोर्टल पर अपलोड किया जाना चाहिए ताकि ऐसी स्थिति में उस पोर्टल की मदद से कर निर्धारण शीघ्र हो जाये, जिससे शासन को राजस्व भी तय समय में मिलेगा और आम व्यक्ति को जो मानसिक एवं आर्थिक नुकसान होता है, उससे भी बचाव होगा।

6. किसी भी शहर में भूमि का उपयोग मास्टर प्लान के अंदर निर्धारित किया जाता है और समय-समय पर सरकार द्बारा उस मास्टर प्लान के पालन के लिए ड्राइव भी चलाई जाती है लेकिन असमंजस उस स्थिति में हो जाता है जब आवासीय क्षेत्र में जिला पंजीयक कार्यालय द्बारा गाइडलाइन के मुताबिक उसकी रजिस्ट्री वाणिज्यिक मानते हुए की जाती है, जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण कलेक्टर गाइडलाइन का यह प्रावधान है कि मुख्य मार्ग से 20 मीटर अंदर तक के क्षेत्र को कॉमर्शियल माना जाता है, चाहे वह मास्टर प्लान के मुताबिक आवासीय एवं पी.एस.पी. ही क्यों न हो?

अत: हमारा सुझाव है कि मास्टर प्लान को कलेक्टर गाइडलाइन से लिंक किया जाना चाहिए ताकि जो क्षेत्र जिस उपयोग के लिए निर्धारित हो, उसी के लिए रजिस्ट्री हो सके तथा भविष्य में बहुत सारे विवाद उत्पन्न न हों।

7. कृषि भूमि के क्रय-विक्रय पर वर्तमान प्रावधान के अनुसार 1000 मीटर तक स्लेब का प्रावधान है और यह रजिस्ट्री जितने खरीददार होंगे, उन सब पर अलग-अलग 1000 मीटर का स्लेब प्रावधान है।

उदाहरणार्थ-यदि कोई कृषि भूमि जो पांच हजार वर्गमीटर है। यदि पांच लोग मिलकर उस भूमि को खरीदना चाहते हैं तो ऐसी स्थिति में पूरी जमीन की गणना प्लॉट के रेट प्रति वर्गमीटर से की जायेगी जो कि बहुत बड़ी विसंगति है। जबकि वास्तविकता में जो धनराशि का अंतरण होता है, वह बीघा के हिसाब से ही होता है और चूँकि आयकर विभाग द्बारा सर्किल/कलेक्टर गाइडलाइन को ही भूमि/भवन के मूल्य निर्धारित करने में मान्यता दी जाती है तब ऐसी स्थिति में आयकर विभाग के मुताबिक वास्तविक कीमत से कई गुना बढ जाती है और निवेशक को उस पर आयकर चुकाना पड़ता है। वह ऐसा आयकर होता है जो इन विसंगतियों के कारण  काल्पनिक आय निर्धारित हुई, उसका परिणाम होता है। ऐसी स्थिति में बहुत सारी जगह के क्रय-विक्रय में यह बाधा बनती हैं व कई विवाद को जन्म देती हैं।

अत: हमारा सुझाव है कि एग्रीकल्चर भूमि जिस पर शासन द्बारा डायवर्सन शुल्क भी लिया जाता है, उसके दस्तावेज के पंजीकरण के वक्त यह स्लेब का प्रावधान आवश्‍यक रूप से हटाया जाना चाहिए।

8. वर्तमान में कलेक्टर गाइडलाइन में यदि किसी भूमि/भवन के बगल में 2 फुट की गली जो कि पुराने मकानों में अक्सर पायी जाती है। यह गली दो पड़ौसियों के बीच में अपनी-अपनी मौरी के निकास के लिए बनाई जाती थीं। ऐसी अवस्था में उस प्लॉट या मकान की कलेक्टर गाइडलाइन में निर्धारित दर पर 10 प्रतिशत अतिरिक्त कॉर्नर प्लॉट सरचार्ज के रूप में जोड़ा जाता है जो कि पूर्णत: अव्यवहारिक है। कॉर्नर प्लॉट  या मकान की गणना के लिए स्पष्ट प्रावधान होना चाहिए कि जिस क्षेत्र में मकान/भूमि स्थित है, उस क्षेत्र की मुख्य सड़कों की चौड़ाई से कम से कम आधी चौड़ाई से अधिक की पायी जाती है, तब उसे कॉर्नर प्लॉट के रूप में माना जाना चाहिए।

9. वर्तमान समय में भूमि के मूल्यवान होने और भविष्य में विवादों को कम करने की दृष्टि से बिल्डर्स द्बारा अथवा कॉलोनाइजर द्बारा या भूमि स्वामी द्बारा अपनी भूमि को स्पष्ट मार्किंग करने हेतु जमीनी लेबल पर ही खण्डे गाड़ दिये जाते हैं, ऐसी जमीन की जब रजिस्ट्री कराई जाती है तो खण्डे मात्र के गड़े होने से उस पर 10 प्रतिशत अतिरिक्त जोड़कर भूमि का मूल्यांकन किया जाता है जबकि यह प्रावधान यदि प्लॉट की नींव खुदी हो तब उस स्थिति में लागू होता है लेकिन उप पंजीयक द्बारा इसको बिना जांचे ही कि नींव खुदी है या मार्किंग के लिए खण्डा गाड़ा गया है, 10 प्रतिशत अतिरिक्त जोड़कर मूल्यांकन कर दिया जाता है।

अत: सुझाव है कि गाइडलाइन में स्पष्ट प्रावधान किया जाए कि यदि प्लॉट/भूमि पर खण्डा मार्किंग के लिए गाड़ा गया है तो 10 प्रतिशत अतिरिक्त मूल्यांकन नहीं किया जाना चाहिए।

10. कमजोर आय वर्ग व निम्न आय वर्ग के लिए आरक्षित भूखण्ड अथवा निर्मित इकाई के अंतरण हेतु अर्धशासकीय उपक्रम नगर निगम/प्राधिकरण/हाउसिंग बोर्ड आदि को कलेक्टर गाइड लाइन अनुसार मूल्यांकन से छूट प्रदान की गई है। अर्थात्‌‍ उनके द्बारा दर्शाये गये मूल्य पर पंजीयन विभाग से दस्तावेज का पंजीयन किया जाता है, जबकि प्राइवेट बिल्डर/डवलपर्स द्बारा इसी श्रेणी की अचल संपत्ति के अंतरण  पर मूल्यांकन में कोई छूट दिये जाने का प्रावधान नहीं है।

इस संबंध में मांग है कि शासकीय उपक्रम के अनुसार प्राइवेट बिल्डर/डवलपर्स के द्बारा अपनी विकसित होने वाली योजना अंतर्गत कमजोर आय वर्ग व निम्न आय वर्ग के लिए आरक्षित संपत्ति अंतरित करने की स्थिति में गाइडलाइन अनुसार मूल्यांकन से छूट प्रदान करते हुए स्वनिर्धारण का प्रावधान होना चाहिए।

11. वर्तमान में पंजीयन विभाग में रजिस्टर्ड होने वाले दस्तावेजों की मूल प्रति ब्लैक एंड व्हाईट दी जाती है, जो कि छायाप्रति के समान प्रतीत होती है क्योंकि पंजीयन कार्यालय में कलर प्रिंट निकालने की व्यवस्था नहीं है, इस कारण भ्रम की स्थिति उत्पन्न होती है।

अत: सुझाव है कि पंजीयन विभाग में रजिस्टर्ड होने वाले दस्तावेजों की मूल प्रति रंगीन प्रदान किए जाने की व्यवस्था की जाए।

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