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सिंघम यानि सियासत का कठपुतला

ग्वालियर:- @ राकेश अचल



उत्तर प्रदेश कैडर के आईपीएस अजय पाल शर्मा  को मीडिया सिंघम के रूप में प्रचारित कर रही है जबकि हकीकत में सिंघम जैसी कोई चीज नहीं होती. जिस वर्दीधारी की पीठ पर सत्ता का हाथ होता है वो सिंघम बन सकता है अन्यथा किसी भी अजयपाल को  एक पल में संजीव भट्ट बना दिया जाता है।
पंजाब के लुधियाना में पले- बढ़े अजय पाल के पिता सरकारी स्कूल में शिक्षक थे। अजयपाल ने बीडीएस करने के बाद यूपीएससी पास की थी।  बंगाल में अजयपाल निरीह मतदाताओं पर सिंघमगीरी करते दिखाई दिए थे. उनका व्यवहार देखकर लग रहा था कि उन्हे चुनाव ड्यूटी के लिए नही बल्कि चुनाव जितवाने के लिए भेजा गया था 
सिंघम ब्रांड पुलिस अफसर होते नहीं बनाए जाते हैं जैसे आज अजयपाल भाजपा के सिंघम बने घूम रहे हैं, वैसे ही अर्जुन सिंह के कार्यकल में मप्र में एक सिंघम अयोध्यानाथ पाठक हुआ करते थे. उन्हे सरकार का संरक्षण था इसीलिए वे कह पाए थे कि -'इन काली टोपी वालों को हिन्द महासागर में डुबो देना चाहिए।
पुलिस का इकबाल बुलंद हर वर्दीधारी कर सकता है, शर्त ये है कि वो कानून का सम्मान करता हो, राजनीतिक दबाब के आगे झुकता न हो और हर समय तबादले पर जाने के लिए तैयार रहता हो. भारतीय पुलिस सेवा का हर अधिकारी सिंघम होना चाहिए, लेकिन होता नहीं है क्योंकि राजनीति एक-दो को ही सिंघम बनाती है.सिंघम हकीकत में सियासत का कठपुतला होता है।
सरकार के इशारे समझने वाले इन अजयपालों की रीढ की हड्डी जितनी मजबूत दिखती है उतनी होती नही है. सिंघम कमजोर के ऊपर जोर दिखाता है लेकिन सत्ता के सामने नतमस्तक रहता है. असली और नकली सिंघम में बुनियादी भेद यही है. नकली सिंघम की असली कमान सरकार के हाथ में होती है असली सिंघम की कमान कानून के हाथ में।
यूपी के सिंघम अजय पाल शर्मा को उनकी बेखौफ कार्यशैली के कारण ‘एनकाउंटर स्पेशलिस्ट’ कहा जाता है.बताया जाता है कि उन्होंने अपने करियर में 500 से ज्यादा पुलिस एक्शन (एनकाउंटर और गिरफ्तारियां) का नेतृत्व किया है.
जौनपुर में एसपी रहते हुए उन्होंने 22 महीनों में 136 मुठभेड़ों का नेतृत्व किया.वहीं रामपुर में तैनाती के दौरान उन्होंने कद्दावर नेता आजम खान के खिलाफ भी सख्त कार्रवाई कर सुर्खियां बटोरीं. पुलिस में सिंघम कोई भी बन सकता है, लेकिन इसके लिए उसे बहुत समझौते करना पडते हैं.अब देखिए यदि सरकार किसी वर्दी वाले के ऊपर से हाथ हटा ले तो वो सिंघम होकर भी सिंघम नहीं रह पाता. संजीव भट्ट बना दिया जाता है।
संजीव भट्ट  का नाम आपने सुना ही होगा. वे गुजरात कैडर के 1988 बैच के पूर्व आईपीएस अधिकारी हैं। वे आईआईटी बॉम्बे से एम.टेक हैं और मुख्य रूप से 2002 गुजरात दंगों के दौरान अपनी भूमिका और तत्कालीन मुख्यमंत्री के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दिए हलफनामे के कारण चर्चा में रहे।
संजीव भट्ट 1988में भारतीय पुलिस सेवा में शामिल हुए थे.1990 के दशक में विभिन्न पदों पर काम किया, जिसमें बनासकांठा में एसपी और राज्य इंटेलिजेंस ब्यूरो में डिप्टी कमिश्नर (इंटेलिजेंस) शामिल था।
संजीव 2002 गुजरात दंगों के समय वे राज्य इंटेलिजेंस में थे। उन्होंने 2011 में सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दायर किया, जिसमें दावा किया कि दंगों के दौरान मुख्यमंत्री ने अधिकारियों की बैठक में हिंदुओं को "गुस्सा निकालने" की छूट देने जैसी बात कही थी.बस यहीं से संजीव को सिंघम मानना इंकार कर दिया गया. मोदी और गुजरात सरकार ने इसे सिरे से खारिज किया 
वर्ष 2015 में "अनधिकृत अनुपस्थिति" के आधार पर उन्हें पुलिस सेवा से हटा दिया गया। उनके खिलाफ विभागीय जांच और अन्य मुद्दे भी थे।
संजीव भट्ट कई पुराने मामलों में दोषी ठहराए गए हैं ,जिनमें से कुछ दंगों के बाद सामने आए या तेज हुए.साल 1990 एक दंगे के दौरान 150 लोगों को हिरासत में लिया गया था, जिसमें एक व्यक्ति की मौत हो गई। भट्ट को आजीवन कारावास की सजा हुई। अप्रैल 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने उनकी जमानत और सजा निलंबन की याचिका खारिज कर दी, लेकिन अपील की सुनवाई तेज करने का निर्देश दिया.
संजीव को 1997 के एक कस्टोडियल टॉर्चर केस में दिसंबर 2024 में बरी कर दिया गया। कुछ अन्य मामलों में भी सुनवाई चल रही है या बरी हो चुके हैं वर्तमान में वे राजकोट सेंट्रल जेल में हैं और कई सजाओं का सामना कर रहे हैं। उनकी पत्नी श्वेता भट्ट लगातार कानूनी लड़ाई लड़ रही हैं और जेल ट्रांसफर आदि के खिलाफ याचिकाएं दायर करती रही हैं।
संजीव समर्थक उन्हें "व्हिसलब्लोअर" मानते हैं, जो दंगों में सत्ता की मिलीभगत उजागर करने के कारण "फंसाए" गए। वे दावा करते हैं कि पुराने मामले राजनीतिक बदले की भावना से दोबारा सक्रिय किए गए.विरोधी/आलोचक उन्हें विवादित अधिकारी बताते हैं।
कहने का आशय ये है कि फिल्मी सिंघम और असली सिंघम में बहुत फर्क है. फिल्मी सिंघम को निर्माता निर्दैशक गढता है जबकि दूसरे सिंघम को सरकार गढती है. जनता के लिए नहीं बल्कि अपने लिए. सरकारी सिंघम का नाम अजय पाल हो या विजय पाल इससे कोई फर्क नहीं पडता. अनेक प्रदेशों में तो लेडी सिंघम भी बनाने का रिवाज है. एक जमाने में श्रीमती किरण वेदी सिंघम का अवतार थीं।
वर्दी सिंघम का कवच है लेकिन उसकी हैसियत सरकारी कठपुतली से ज्यादा नही होती. मैंने अपने आधी सदी के पत्रकारिता के सफर में तमाम सिंघमों को नेताओं के चरण चापते और पैग बनते देखा है.आज तो हर पुलिस वाले में सिंघम बनने की होड है. क्योंकि सिंघम बनकर आप कमा भी सकते हैं और ख भी सकते है।

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