सोच काकरोची है या बेरोजगार ?
ग्वालियर:- @ राकेश अचल
मैं सोचता था कि भारत में केवल मतिमंद नेताओं की ही जुबान फिसलती है, लेकिन मैं सौ फीसदी गलत था. क्योंकि जुबान फिसलने के मामले में माननीय न्यायाधीश भी पीछे नहीं हैं. देश के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने बेरोजगारों को लेकर जो कहा है वो विचलित करने वाला है. उन्होंने कहा कि कुछ “बेरोजगार युवा कॉकरोच की तरह” मीडिया, सोशल मीडिया और आरटीआई एक्टिविस्ट बन जाते हैं और फिर “पूरे सिस्टम पर हमला करने लगते हैं।”
यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट में एक वकील की वरिष्ठ अधिवक्ता बनाए जाने की याचिका की सुनवाई के दौरान आई. मुख्य न्यायाधीश. ने कहा कि समाज में पहले से ही ऐसे परजीवी हैं.मौजूद हैं जो व्यवस्था पर लगातार हमले करते रहते हैं।
मेरी समझ में नहीं आ रहा कि मुख्य न्यायाधीश की इस टिप्पणी को किस श्रेणी में रखा जाए. क्या है जुबानृ की फिसलन है, या तजुर्बा? तजुर्बा है या फिर अज्ञान. अज्ञान है या हेट स्पीच? ये कुछ तो है. इसे 'काकरोची सोच '!
माननीय सीजेआई सूर्यकांत के प्रति मेरे मन में न कोई आग्रहहै और न पूर्वाग्रह. किंतु मुझे लगता है कि इस तरह की टिप्पणी उन करोडों बेरोजगरों के मन में पीडा भर देती है. एक तो बेरोजारी का दंश और ऊपर से उनके ऊपर काकरोच का विशेषण चस्पा कर देना घोर अपमान है।
ताज़ा सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत की बेरोजगारी दर 2025-26 में लगभग 3.1 प्रतिशत से 5.2 प्रतिशत के बीच बताई गई है.मान लीजिये कि भारत की कुल श्रमशक्ति (लगभग 55–60 करोड़ लोग हैं तो देश में बेरोजगारों की संख्या लगभग 2 करोड़ से 3 करोड़ के बीच बैठती है. इनम शहरी बेरोजगारी ग्रामीण इलाकों से ज्यादा है..युवाओं और शिक्षित वर्ग में बेरोजगारी सबसे बड़ी समस्या बनी हुई है।
मुख्य न्यायाधीश के नजरिये और सरकार का नजरिया एक जैसा है. शायद उन्है ये नहीं पता कि इस देश में बेरोजगारी इसलिए है क्योंकि उनके पास डिग्री है, नौकरी नहीं.इंजीनियर, प्रबंधन , ग्रेजुएट और यहां तक कि पीएचडी धारक भी छोटी नौकरियों के लिए आवेदन कर रहे हैं।
मुझे लगता है कि हमारे सीजेआई को सरकार ने ये नहीं बताया कि सरकारी नौकरियों का संकट कितना है? लाखों पद खाली हैं,भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक हो रहे है.भर्ती प्रक्रिया में वर्षों की देरी हो रही है. मप्र में तो सरकार ने एक झटके मेलाखों सरकारी पद समाप्त कर दिए . किसी ने सरकार का हाथ पकडा?
अगर बेरोजगारों के बारे में सुप्रीम कोर्ट की राय भी मुख्य न्यायाधीश की राय है तो मुझे कुछ नहीं कहना, लेकिन यदि दोनों की राय अलग अलग है तो मैं इस टिप्पणी की आलैचना निर्मल मन से करता हूँ. मेरा इरादा माननीय मुख्य न्यायाधीश की अवमानना करना नहीं है.
सरकार तो सरकार है. वो रोज रोजगार बढ़ने का दावा करती है, सरकार ने दिहाड़ी,गिग वर्क,डिलीवरी जॉब,अस्थायी काम,या मजबूरी का स्वरोजगार
भी “रोजगार” माना लिया है।
असली सवाल ये है कि क्या हम अपने चश्मोचिरागों को काकरोच मान लें या फिर उन्हे काकरोच कहने वालों से बचाएं. मीलार्ड हमारे बच्चे काकरोच नहीं है. उन्हे सरकारों द्वारा काकरोच बनाया जा रहा है. सरकार को भी रोकिये और अपने आपको भी।

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