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मेलोडी इतनी चाकलेटी क्यों है मोदीजी?

ग्वालियर:- @ राकेश अचल



मैं पहली बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का शुक्रगुजार हूँ क्योंकि उन्होंने पारले की मैलोडी चाकलेट से जुडा चार दशक पुराना सवाल हल कर दिया. मैलोडी वाले अक्सर पूछते थे कि -' मैलौडी इतनी चाकलेटी क्यों है?'मैलोडी वालों ने हरकत की और सवाल को उलझाते हुए कहा-'मैलौडी खाओ और खुद जान जाओ'

यकीन मानिये कि भारत के लोग 1983 से मैलौडी खा रहे हैं और आज तक नही जान पाए कि 'मैलौडी चाकलेटी क्यों है?' भला हो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कि उन्होंने नामचीन्ह इटेलियन प्रधानमंत्री मेलौनी को उपहार में पारले की चाकलेट मैलौडी देकर ये बता दिया कि मैलौडी आखिर इतनी चाकलेटी क्यों है?

मैलोडी, मेलोनी और मोदीजी को लेकर विपक्ष खामखां बखेडा खडा कर रहा है. हकीकत तो ये है की मोदीजी ने दलदल में फंसी भारतीय अर्थव्यवस्था को बाहर निकालने के लिए मैलोनी और मैलोडी का सहारा लिया है. मोदीजी पहले पेटीएम के विज्ञापन में नजर आए थे और पेटीएम चल पडा था. अब मोदी जी मैलौडी और मैलोनी के साथ नजर आए हैं, यकीन मानिये कल से ही अब दोनों चल पडेंगे.इसलिए राष्ट्र को मोदीजी के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए, न कि उनकी निंदा करना चाहिए.

एक समय था जब  गली-मोहल्ले की हर छोटी-बडी दुकान के काउंटर पर कांच की बड़ी बरनियों में मेलोडी टॉफियां भरी रहती थीं. स्कूल में जन्मदिन मनाने वाले बच्चे इन्हीं टॉफियों को बांटते थे और कुछ पैसों में मिलने वाली यह टॉफी बच्चों के चेहरे पर खुशी ला देती थी.आज भी मेलोडी सिर्फ एक टॉफी नहीं, बल्कि लोगों के बचपन की याद बन चुकी है. बाहर से कारमेल और अंदर से चॉकलेट से भरी यह टॉफी दशकों बाद भी लोगों की पसंद बनी हुई है. 

 बात 46 साल पहले 1980 के दशक  की है. उस समय टॉफी और कैंडी का बाजार तेजी से बढ़ रहा था. उस समय कैडबरी की 'एक्लेयर्स' बाजार में काफी लोकप्रिय थी. इसी बीच पार्ले ने मेलोडी नाम की टॉफी लॉन्च की. कॉन्सेप्ट थोड़ा मिलता-जुलता था,  बाहर कारमेल और अंदर चॉकलेट, लेकिन पार्ले इसे अलग पहचान देना चाहता था.

तब पार्ले की विज्ञापन एजेंसी 'एवरेस्ट' को यह जिम्मेदारी दी गई कि मेलोडी को बाकी टॉफियों से अलग कैसे दिखाया जाए. इसी दौरान जन्म हुआ उस लाइन का, जो आज भी लोगों की जुबान पर है - मेलोडी इतनी चॉकलेटी कैसे है? और फिर जवाब था -मेलोडी खाओ, खुद जान जाओ!

बस इस एक लाइन ने मेलोडी की किस्मत बदल दी.  इस टैगलाइन को कॉपीराइटर सुलेखा बाजपेयी ने लिखा था. वहीं 'मेलोडी है चॉकलेटी' वाला जिंगल भी लोगों के दिमाग में बस गया. आज  कोई सुलेखा को  नहीं जानता लेकिन मैलौडी को सब जानते हैं.पार्ले का मकसद लोगों में जिज्ञासा पैदा करना था. कंपनी चाहती थी कि लोग खुद सोचें कि आखिर इस टॉफी में ऐसा क्या खास है. यही रणनीति काम कर गई और मेलोडी बच्चों से लेकर युवाओं तक की पसंद बन गई.

मुझे याद है कि मेलोडी के टीवी विज्ञापन काफी लोकप्रिय हुए थे.किसी विज्ञापन में कोच पूछता था - मेलोडी इतनी चॉकलेटी कैसे है? तो कहीं टीचर यही सवाल करती दिखती थीं. हर बार जवाब एक ही होता था - मेलोडी खाओ, खुद जान जाओ! इन विज्ञापनों ने मेलोडी को सिर्फ टॉफी नहीं, बल्कि पॉप कल्चर का हिस्सा बना दिया.

मोदीजी से पहले  2019 में फिल्म 'छिछोरे' में भी इसी डायलॉग को मजेदार अंदाज में इस्तेमाल किया गया. सोशल मीडिया पर भी यह लाइन मीम्स के जरिए लगातार वायरल होती रहती है.यानी, 40 साल बाद भी सवाल वही है - 'मेलोडी इतनी चॉकलेटी क्यों है.

मुझे लगता है कि मैलोडी अब विदेशनीति और कूटनीति में भी अहम भूमिका निभाने वाली है. आज मोदीजी ने मैलोडी देकर मेलोनी को लुभाया है कल मुमकिन है कि वे डोनाल्ड ट्रंप को, ईरानी खोमेनोई को, पाकिस्तानी मुनीर को मैलोडी देकर भारत का दोस्त बना लेंगे. राजनीति में बढती कडवाहट भी चाकलेटी मैलोडी के जरिये मिठास में बदली जा सकती है. मैं तो कहूंगा कि देश में उन 80 करोड लोगों को मुफ्त अनाजके साथ एक-एक मैलोडी भी वितरित करना चाहिए.जिन्होने कभी मेलौडी नहीं खायी.

आने वाले चुनावों में भाजपा मैलोडी को अपने चुनाव घोषणा पत्र  में शामिल कर  नया जुमला ला सकती है कि मैलोडी खाओ, भाजपा की चौथी बार सरकार बनाओ. कल क्या होगा, कोई नहीं जानता किंतु मैं इतना जरूर जानता हूँ कि चाकलेट का जितना बेहतर इस्तेमाल मोदीजी ने किया है उतना न नेहरूजी कर पाए न इंदिरा गांधी न अटल बिहारी वाजपेयी. हमारी सरकार मैलोडी का निर्यात बढाकर विदेशी मुद्रा भी कमा सकती है और सोना भी. आखिर मैलोडी, मैलोनी और मोदीजी एक साथ जो है.


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